Friday, January 16, 2026

सोच, Thought Process,

आपकी सोच ही आपकी जीवन विधाता है,
यही वो सूत्र है, जो भाग्य को जगाता है।
न कोई ग्रह-नक्षत्र, न कोई लकीर हाथ की,
सोच ही तय करती है, सीमा हर बात की।
जैसा भाव मन में है, वैसी ही सृष्टि है,
सोच अगर सुंदर हो, तो पावन हर दृष्टि है।
दुखों के अंधेरे में भी, जो उम्मीद सजाता है,
वही तो अपनी राह का, सूरज बन जाता है।
गिरे हुए को उठा दे, या उड़ते को गिरा दे,
सोच चाहे तो मिट्टी को भी, सोना बना दे।
दुनिया का हर मंजर, बस एक आईना है,
अपनी ही सोच को, बस खुद ही पहचाना है।
कठिन रास्तों पर भी जो, खिलखिलाता है,
वो अपनी तकदीर, खुद ही लिखता जाता है।
याद रखना यह सच, जो जग को भाता है,
आपकी सोच ही आपकी जीवन विधाता है।
     ....... सर्वेश दुबे 
        १५/०१/२०२६
           
 

Friday, January 2, 2026

तू और सिर्फ तू

इस दुनिया में  मेरा दिल भी एक मुल्क है
इसकी कुल और कुल आबादी सिर्फ तू है।
नक़्शे में दर्ज़ नहीं ये सरहदें मेरी,
मेरी हर हद, हर आज़ादी सिर्फ तू है।

यहाँ क़ानून नहीं, एहसास चलते हैं,
मेरी हर एक अदालत की गवाही सिर्फ तू है।
तेरी ख़ामोशी से लगता है कर्फ़्यू यहाँ,
मेरी हर इक बग़ावत की वजह सिर्फ तू है।
शहर वीरान लगे, अगर तू न दिखे,
मेरी हर एक रौनक में सिर्फ तू है।
न तख़्त चाहिए, न ताज, न हुकूमत कोई,
मेरी हर एक सल्तनत की बुनियाद सिर्फ तू है।
यहाँ जंगें नहीं होतीं, बस इंतज़ार रहता है,
मेरी हर एक जीत, हर इक शिकस्त सिर्फ तू है।
मेरे हर ख़्वाब की ताबीर में तू ही तू,
मेरी हर एक दुआ की इबादत सिर्फ तू है।
अगर पूछे कोई मुझसे मेरी पहचान क्या है,
मेरी हर एक कहानी की पहचान सिर्फ तू है।
दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए,
मेरे इस छोटे से दिल की पूरी कायनात सिर्फ तू है।
 .....सर्वेश दुबे

Wednesday, December 31, 2025

First Love, पहला प्रेम

पहला प्रेम कभी ना भूले, 
चाहे कितना जोर लगा लो,
यादों के संदूक पे चाहे, 
कितने भी तुम ताले डालो।

वो कोरे कागज़ पर लिखा, 
पहला उसका नाम निराला,
जैसे तपती धूप में कोई, 
शीतल चंदन की माला।

वक्त की परतें जम जाती हैं,
 चेहरे बदल ही जाते हैं,
नये मुसाफ़िर जीवन की, 
राहों में मिल ही जाते हैं।

पर वो जो पहली दस्तक थी, 
वो गूँज कहीं रह जाती है,
भीड़ भरी इस दुनिया में भी, 
तन्हा हमको कर जाती है।

वह साथ बिताए लम्हें भी, 
तस्वीर बने रह जाते हैं,
वो बिन बात के उसका हँस देना, सब याद हमें रह जाते हैं।

न मका मिला न  मिली है मंजिल, 
बस एक अधूरा किस्सा है,
पर सच तो ये है कि वो ही, 
रूह का अब भी हिस्सा है।

आज भी जब  बारिश की,
 पहली बूंद जो गिरती हैं,
मिट्टी की सोंधी खुशबू में, 
वही यादें फिरती रहती हैं।

भूलना चाहो तो भूले कैसे, 
वो तो रगों में बहता है,
इंसान भले ही बदल जाए, 
पर अहसास वही तो रहता है।

उसे पाने की हसरत नहीं अब, 
न खोने का कोई गम है,
वो बस एक महक है यादों की,
 जो आज भी आँख में नम है।
  .... सर्वेश

Saturday, December 27, 2025

जिंदगी, life

हर एक मोड़ पर हँस के गुजरती है ज़िंदगी,
ग़मों के बीच भी रौशनी भरती है ज़िंदगी।

जो ठोकरों में भी हौसले का गीत गुनगुनाए,
उसी के नाम अपनी कहानी करती है ज़िंदगी।

कभी घटा, कभी धूप, कभी राते भी देती है,
हर एक रंग में खुद को निखारती है ज़िंदगी।

सफ़र में साथ चलें तो बोझ सब हल्का लगे,
मोहब्बतों से ही अपनी पहचान करती है ज़िंदगी।

जो गिर के फिर उठे, वो फतह के काबिल बने,
हौंसलों की जीत पर ही मुस्कराती है ज़िंदगी।

शिकायतों से कहीं बेहतर शुक्र करना सीख ले,
क़दर करने वालों को ही भरपूर मिलती है ज़िंदगी।

नफ़रतें छोड़, दुआओं की फ़सल बो दे "सर्वेश",
खिलखिलाके हर दिल में जगह करती है ज़िंदगी।
     .......सर्वेश दुबे
          ०९/१२/२०२५

Monday, November 10, 2025

संबंधों की परिभाषा, || रुके, देखें और सुने ||

रुके, देखे और सुने
इन तीनों का योग
था,
 मनुष्यों का पहला धर्म,
पहला स्पर्श, पहली पहचान।

जो रुकना नहीं जानते,
वे केवल मिलते हैं
जुड़ते नहीं।
क्योंकि जो जुड़ना चाहता है,
वह पहले अपनी रफ़्तार रख देता है
दूसरे की साँसों के बराबर।

संबंध समय नहीं माँगते,
सिर्फ़ एक सचेत पल बुलाते हैं
जिसमें आप सच में उपस्थित हों।

देखना
सिर्फ़ चेहरा नहीं,
उस पर चढ़ी थकान,
हल्की-सी चिंता,
और मुस्कान के पीछे छिपा
अनबोला संघर्ष।

सुनना
सिर्फ़ शब्दों की ध्वनि नहीं,
उस दिल की धकधक
जो आवाज़ से पहले उठती है।

कई बार “हूँ” भी संवाद होता है,
और कई बार पूरी बात सुनकर भी
लोग कुछ नहीं सुनते।
रिश्ते इन्हीं दोनों के फर्क पर टिके होते हैं।

जो रुक कर सुनता है,
वही मिट्टी को आकार दे पाता है।
जो देख कर समझता है,
वही पेड़ उगा पाता है।
और जो बिना बोले साथ निभाता है,
वही पेड़ को छाया तक ले जाता है।t

संबंध शब्दों से नहीं
इरादों से टिकते हैं।
दिल की सच्ची नमी ही
हर पत्ते को हरा रखती है।

समय सब ठीक कर देता है।
दुनिया यह मानती है
पर सच यह है
समय नहीं,
नीत, नीयत और नर्मी
रिश्तों को थामती है।

जो मन में जगह दे दे,
वह दिल में घर बना लेता है।
जो मौन में सुन ले,
वह जीवनभर समझ में बस जाता है।

रुके, देखे और सुने
इसी क्रम में जन्म लेते हैं
विश्वास, अपनापन, और प्रेम।

और जब यह तीनों जन्म लेते हैं
तो दूरी भी मिटती है,
अहं भी पिघलता है,
और संबंध एक ऐसी डोर बन जाते हैं
जो समय के रस्साकशी में
कभी नहीं टूटता है।
     ........ सर्वेश
     (०९/११/२५)

Friday, November 7, 2025

पिता, बाप,

मैंने अपनी धूप समेटकर तेरे हिस्से की छाँव बनाई,
खुदके सपनों को मोड़कर तेर
सपनो की राह बनाईं।
आज तू ऊँचाई छूता है तो आँखें भर आती हैं मेरी,
क्योंकि हर बेटे की उड़ान में, बाप ने कहीं अपनी जड़ें लगाईं।
               ..... सर्वेश

Friday, October 31, 2025

सच्ची मित्रता

मित्र वही जो रोक दे, जब तू राह भुलाए,
मीठे बोल न झूठ के, सच के दीप जलाए।
    ....सर्वेश दुबे
    २८- १० - २०२५

Thursday, October 30, 2025

विरह का दर्द

वर्षा ऋतु में मनवा बोले,
प्रिय बिन मन न लागे।
दो घड़ी की हुई विरह मे,
दर्द बरस का  लागे।
  ...... सर्वेश
३०/१०/२०२५

Friday, October 24, 2025

प्रेम कविता, हमने फूल भेजा

हमने उनको फूल भेजा तो उन्होंने भी गुलाब भेज दिया,

दिल की बात समझे शायद, हमें जवाब भेज दिया।

उनकी आँखों में चमकती है जैसे कोई रौशनी,
ख़्वाब देखा हमने और उन्होंने ख़्वाब भेज दिया।

फ़ासले मिट गए चुपके से उनकी यादों में,
हमने साँस ली मोहब्बत की, उन्होंने हिजाब भेज दिया।

जाने कैसी मोहब्बत है कि असर गहरा हुआ,
हमने लिखी तड़प तो उन्होंने इतराब भेज दिया।

अब तो "सर्वेश" की शायरी भी उनके दिल तक जा पहुँची,
हमने अशआर कहे तो उन्होंने किताब भेज दिया।
       .....सर्वेश दुबे
     ०२- ०९ - २०२५

शुभ दिवाली

 दीपोत्सव की ढेरों शुभकामनाएं 

जगमग दीप जले हर आँगन में, 
हर कोना मुस्काए,
माँ लक्ष्मी के चरण पड़े , 
खुशियों के फूल खिलाए।

बुद्धि और सुख के दाता,
श्री गणपति  पूजे जाएँ, 
 कृपा से उनकी, सारे विघ्न-विकार दूर हो जाए

सोने सी चमके हर हथेली,  
हर हाथ कर्म से उजियारा हो,
हर मन में प्रेम का दीप जले, 
ना किसी भी घर में अंधियारा हो।

 कण कण धरा का रोशन हो,
हर खेत स्वर्ण की भांति सजे
हर दिल में सूरज आशा का 
घर घर में मंगल गान बजे

बाजे बजें, हँसी बिखेरे,
 दीपक चमके घर घर मे,
 माँ लक्ष्मी सुख समृद्धि दे
गाँव गाँव और शहर शहर में

सपने सबके पूरे हों 
और जीवन में उल्लास रहे
स्नेह सुगंध हम मिल फैलाए 
और आपस में विश्वास रहे।

माँ लक्ष्मी की कृपा रहे
श्री गणपति का आशीर्वाद,
मेरी यही शुभकामना सबको 
जीवन में ना हो कोई अवसाद ।
   ... सर्वेश दुबे
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विरह ,मीत,वेदना

 मीत विरह की वेदना              ऊर्जा से भरपूर.......

मिलने को मैं उड़ चला            लाख गगन हो दूर.......

@सर्वेश

स्वदेशी अपनाओ

सामान खरीदे वही
जो बना हो यही,
स्वदेशी समान धन ही नहीं सम्मान भी बढ़ाएगा।
तभी तो भारत जगमगाएगा 

माटी की खुशबू से जुड़ा हर धागा,
कर्मठ हाथों का परिश्रम इसमें जागा,
हर खरीद एक नवदीप जलाएगा,
देश का गौरव और ऊँचा उठाएगा।

हर कतरे में मेहनत का रंग,
हर बूँद में श्रम का संग,
किसान, कारीगर का सपना सजाएगा,
भारत का तिरंगा हर दिशा में लहराएगा।

विदेशी चमक भले लुभाए नज़र को,
पर मिटा न पाए देश की जड़ को,
आओ मिलकर प्रण ये दोहराएँ,
स्वदेशी अपनाएँ, भारत को सजाएँ।

विदेशी दिखावे से दिल न भरें,
अपनी मिट्टी से रिश्ते न तोड़ें,
गाँव–गली का हुनर जगमगाएगा,
स्वदेशी अपनाओगे भविष्य सँवर जायेगा।

चौपाल से लेकर शहर की दुकान,
हर जगह बजे स्वदेशी का गान,
रोज़गार बढ़े, हर घर मुस्काएगा,
आत्मनिर्भर भारत तभी तो बन पाएगा

आओ मिल सब स्वदेशी अपनाए 
भारत के मान को मिल हम  बढ़ाए
आओ मिल हम एक स्वर में गाएँ,
भारत माँ का मान हरपल बढ़ाएँ।

   ....सर्वेश दुबे

Monday, September 15, 2025

Engineer's Day अभियंता दिवस ,

गणना में रस घोलकर, सपनों को दे रूप।
अभियंता जग का करे, नवसृजन अनूप।।

ईंट गगन को छू सके, सेतु मिलाएँ पार।
प्रगति-पथ पर चल पड़े, जग के सब परिवार।।

लोहे में भी प्राण भर, ध्वनि में लाए राग।
निर्माणों से जगमगाए, जीवन का हर भाग।।

विज्ञान और कला मिले, कर्म बने उत्सव।
अभियंता की साधना, रचे सृष्टि नव-स्वर।।

पुल नभ से धरती जुड़ें, धरा से सागर-तट।
अभियंता से हो सके, भविष्य का नव-वट।।
          ..... सर्वेश 

अभियंता दिवस की अशेष शुभकामनाएं💐💐

Sunday, September 14, 2025

हिंदी दिवस की shubhkamnaaye

मैं भारत मां की शान हूँ,
मैं हिन्दी, भारत की जान हूँ।
माँ के चरणों का वरदान हूँ,
मैं हिंदी, भारत मां की पहचान हूँ।।

वेदों की वाणी से उपजी,
गीता की अमर गाथा हूँ।
मीरा-सूर-तुलसी का रस,
कबीर की साखी साथा हूँ।
मैं हिंदी, भारत मां की पहचान हूँ।।

झाँसी की रण-चेतना हूँ,
आज़ादी की हुंकार हूँ।
भगत-सुखदेव की गूँज अमर,
क्रांति का पावन जयकार हूँ।
मैं हिंदी, भारत मां की पहचान हूँ।।

गंगा-यमुना की धारा हूँ,
खेत-खलिहान की बयार हूँ।
गाँव-नगर का संगीत बनी,
भारत की आत्मा अपार हूँ।
मैं हिंदी, भारत मां की पहचान हूँ।।

महादेवी की करुणा हूँ,
प्रेमचंद की पहचान हूँ।
साहित्य का अनुपम उत्सव,
संस्कृति का सम्मान हूँ।
मैं हिंदी, भारत मां की पहचान हूँ।।
      ....सर्वेश दुबे

हिंदी दिवस की अशेष शुभकामनाएं 💐

Saturday, September 13, 2025

संघर्ष ने रोका नहीं, सँवारा है

रोशनी की खोज में अंधेरे में भटकता रहा,
साये ने राह दिखाई मगर मंज़िल न दिखी कहता रहा ।
खुद की लौ जलानी पड़ी तब जाकर समझा,
उजाला बाहर नहीं, दिल के अंदर ही है छिपा।
ठोकरों ने सिखाया कि गिरकर भी बढ़ना है,
हर दर्द ने जताया कि सपनों को गढ़ना है।
जब तक साँसों में हिम्मत की धड़कन रहेगी,
रात कितनी भी गहरी हो, सुबह जरूर ढलेगी।
अब राहें खुद मुझसे रौशनी माँगती हैं,
मेरी कहानी से उम्मीदें जागती हैं।
अंधेरे ने मुझे रोका नहीं, सँवारा है,
मैं वही दीप हूँ जो तूफ़ानों को भी गवारा है।

 – सर्वेश