Wednesday, November 12, 2008

ये मन का जो रिश्ता है

भावो मे बस दिखता है
ये मन का जो रिश्ता है

ना वासना, ना लालच
ना पैसे से बिकता है
ये मन का जो रिश्ता है।

लाख छिपाये दुनिया से तू
पर आँखो मे बसता है
ये मन का जो रिश्ता है।


ना कोई भाषा ना परिभाषा
तेरी खुशियाँ मेरी आशा
नाम नया क्या दू
इस रिश्ते को
ये बस मन का रिश्ता है।

तेरे हर आहट का स्पन्दन
मेरे दिल को कैसे होता
मै तो बस इतना ही जानू
ये मन का जो रिश्ता है

ना टूटे ये साथ कभी
दिल ये ही आशा करता है
रंग रूप ना और कोई सीमा
ये मन का जो रिश्ता है।

ना चाँहू मै धन तेरा
ना चाँहू मै तन तेरा
बना रहे ये भाव हमारा
ये मन का जो रिश्ता है।

इस रिश्ते कि डोर सभी रे
हाथ हमारे है मितवा
ये टुटे तो दिल दुखता है
ये मन का जो रिश्ता है।


दिवाली

हर चेहरे पे खुशियाँ हो
और जीवन मे हरियाली हो
शहर गाँव सब विकसित हो
घर - घर मे खुशहाली हो
यही पार्थना प्रभु से मेरी
मंगलदीप दिवाली हो

कोई दुखी मन धरा पे हो ना
चमके धरा का कोनाकोना
फ़ोड पटाखे खुशियाँ मनायें
खील बताशे जमकर खाये
पकवान भरी हर थाली हो
यही पार्थना प्रभु से मेरी
मंगलदीप दिवाली हो

गणेश लक्ष्मी की महिमा हो
हर जन की अपनी गरिमा हो
धन सम्प्दा घर आये अपार
खुशियों से भर जाये संसार
रजत बने धरती का कण-कण
ना कोई कोना खाली हो
यही पार्थना प्रभु से मेरी
मंगलदीप दिवाली हो

नुतन

यह समय नही अब चुप रहने का
जीवन मे उत्साह भरो
पाँच खिडकियों वाले घर की
अब नूतन उपयोग करो
कटंक पूर्ण जो राहे है
उनको प्रशस्त अब करना है
भौतिकता को दुर करो अब
सहज भाव से रहना है
प्राचीन गौरवों को सहेज
नये गौरव पैदा करना है
नव ऊर्जा के स्रोत हो तुम
नई खोज तुम्ही को करना है
नई खोज तुम्ही को करना है
सर्वेश तुम्ही को बनना है
सर्वेश तुम्ही को बनना है.

दशहरा

अपका दशहरा,
हो प्यार से हरा भरा
खुशियो से युक्त रहो,
दु:ख ना हो जरा
प्रगति के नये सोपान लि्खो
धन सम्प्दा से युक्त दिखो
इस धरा पे तुम कर दो कुछ नया
हर दिशा मे तेरा नाम हो बया
अपका दशहरा, हो प्यार से भरा
खुशियो से युक्त रहो,
दु:ख ना हो जरा

हास्य व्यंग - कम्पलेन - घर की घंटी

मालिक ने बिजली मिस्त्री को अपने पास बुलाया,
पूछा मान्या मेम साब के घर की घन्टी ठीक कर आया
इस कम्पलेन का नाम सुनते उस्अने गुस्से मे बोला
कैसे ठीक करता जब मेम साब ने दरवाजा नही खोला
फिर मिस्त्री ने अपनी आप बीती सुनायी
वो तो मेरा दिल हि जानता है श्रीमान जी कि
बिना खाये पिये मैने कितनी देर घन्टी बजायी “

बचपन की बारिश

मेरे बचपन की बारिश

बचपन मे जब बारिश आती थी
और बादल भी गरजता था,
होकर नंग धडंग नहाता,
ऊछल कूद खूब करता था
माँ बाबू जी कितना बोले
अलमस्ती मे रहता था।
भईया की किताबों से
पन्ने खुब चुराता था
कागज की नाव बनाता था
और पानी मे बहाता था
एक नही हर बारिश मे
बस ऐसा ही करता था।
भीग भाग कर जब घर पँहुचू
माँ तो डाँट सुनाती थीं
भीगा बदन हमारा होता
उसको वो सुखाती थी
छीक- छीक कर हाल बुरा जब
माँ ही विक्स लगाती थी
कल से नही शैतानी होगी
माँ से ऐसा कहता था
एक नही हर बारिश मे
बस ऐसा ही करता था।
एक नही हर बारिश मे
बस ऐसा ही करता था।