प्रेम कोई उत्सव नहीं, जो शोर में मनाया जाए,
प्रेम तो वह प्रार्थना है, जो बस एकांत में ही दोहराया जाए।
यह दो शरीरों का मिलन भर नहीं है महज,
यह एक आत्मा का दूसरी में, चुपके से उतर जाना है।
जैसे रेत के भीतर कहीं कोई सोता (झरना) बहता है,
जैसे पतझड़ के बाद भी पेड़ों में विश्वास रहता है,
वैसे ही प्रेम, अभावों में भी पूर्णता की तलाश है,
यह धरती के हृदय में छिपे, असीम आकाश का आभास है।
इसमें पाना कुछ भी नहीं, बस खोते चले जाना है,
खुद को मिटाकर, किसी और में हो जाना है।
जहाँ शब्द थक कर लौट आते हैं चौखट से अक्सर,
वहाँ से शुरू होता है, प्रेम के मौन का मीठा सफर।
न कोई शर्त है इसकी, न कोई इसका किनारा है,
प्रेम तो बस... डूबते हुए को डूबने का ही सहारा है।
स्वरचित ....सर्वेश दुबे
२७/०१/२०२६


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