Tuesday, January 20, 2026

शीर्षक- प्रज्ञा-ज्योति: साक्षरता का महायज्ञ


तटिनी-तट पर बैठी माँ, देती ये पावन संदेश,
ज्ञान के आलोक से ही, मिटे अविद्या का क्लेश।
श्वेत कमल पर विराजित, शुभ्र-वसना शारदे,
जड़ जगत की मूढ़ता को, बोध का वरदान दे।
वो स्वर्ण-रश्मि जो फैली, हर दिगंत के भाल पर,
जगाए चेतना को माँ, हर एक के अंतस्तल पर।
नीरव जल के स्पंदन में, शिक्षा का आभास हो,
देश के हर आँगन में, अब साक्षरता का वास हो।
वीणा के हर तार से, गूँजे ज्ञान का तीव्र नाद,
मिट जाए जग से अब, अशिक्षा का यह विषाद।
अनपढ़ता की बेड़ियों को, अब हर मानव तोड़ेगा,
पुस्तक से नाता जोड़कर, प्रगति-पथ पर दौड़ेगा।
माँ! तव आशीष से ही, लेखनी यह सक्षम बने,
अंधकार से लड़ने को, हर हाथ एक मशाल तने।
हर बालक और बालिका, शिक्षा का अधिकार पाए,
ज्ञान का अमृत पीकर, अपना भविष्य स्वयं सजाए।
ज्ञान का दीपक जले, हर घर और हर ग्राम में,
सार्थकता हो जीवन की, विद्या के शुभ काम में।
सृजन की ऊर्जा बहे, इस राष्ट्र के हर प्राण में,
साक्षर बने भारत हमारा, गूँजे ये हर कान में।
रचनाकार: सर्वेश दुबे 
१८/०१/२०२६

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