पीली सरसों लहलहाई,महकी अमवा-डाल।
बिन साजन ये ऋतु सखी, लगती है जंजाल।।
कोयल बैठी बाग में, गाए विरह की तान।
परदेशी की याद में, सूख रहे हैं प्राण।।
आया मधुमास द्वार पर, ओढ़े चूनर लाल।
बिरहन बैठी राह में, बुरा हुआ है हाल।।
घर-आंगन सूना पड़ा, फाग उड़े चहुँ ओर।
मन की वीणा बज रही, खींच रही है डोर।।
पेट की आग ने छीना है, फागुन का उल्लास।
साजन ढूँढे रोटियाँ, मैं ढूँढूँ उनका पास।।
सर्वेश दुबे
२१/०२/२०२६


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