जीवन की यह अजब बुनावट,
सबका अपना-अपना पथ है,
अपनों के ताने-बाने पर,
चलता यह जीवन का रथ है।
कटुता का जब शूल चुभे तब,
रिश्तों की चादर है उधड़ती,
संवाद-सुई और स्नेह-सूत से,
बिगड़ी बात यहाँ सँवरती।
'क्षमा-बूँद' जब उतरी दिल पर,
हर कड़वाहट दूर करे
क्षमा का एक टुकड़ा मिलते,
सारे उलझन दूर करे
उधड़े-उधड़े इस जीवन में,
मृदु प्रेम-तुरपाई कर ले तू,
नफ़रत के सारे पतझड़ में,
नव-मधुमास फिर भर ले तू।
मान और अपमान यहाँ पर,
आते-जाते चंचल मेहमान,
अहंकार की इस आँधी में,
खो जाता मानव का ज्ञान।
अहं मिटाकर, नत मस्तक हो,
समानभूति की राह बना,
इस उलझन से भरे जगत में,
आत्मीयता का मार्ग बना।
सिल्क-सी कोमल इस दुनिया को,
सुलझाना ही जीवन-सार,
सुई-धागे की इस युक्ति से,
सजग रहे निज का संसार।
प्रेम-सुधा की बूँद पिए जो,
उसे मिला हर धागा पावन,
हर उधड़न में नव-सृजन छिपा,
हर मन बन जाता है फिर सावन।
….. सर्वेश दूबे
स्वरचित २३/०८/२०२६
