आईना पर मुझे मेरी एक पुरानी कविता याद आ गई
....आईना और मै...
इस पार खड़ा मैं मौन खड़ा,
उस पार खड़ा संसार वही,
पर बीच खड़ी है एक परत,
जो कहती है हर बार यही
तू जिसे देख खुश होता है,
वह केवल एक प्रतिछाया है,
तू जिसे सत्य समझता है,
वह केवल रूप की माया है।
आईने का क्या दोष बताओ,
वह तो केवल सत्य कहे,
तू हार मान ले जीवन से,
या संघर्षों में नित्य बहे।
जब थका-माँदा बाहर से आकर,
तू सम्मुख मेरे झुकता है,
तब दुनिया का हर कोलाहल,
पल भर को आकर रुकता है।
चेहरे के तिल गिनता हूँ मैं,
माथे की लकीरें पढ़ता हूँ,
मैं तेरे भीतर सोई हुई,
उन अनगिनत पीड़ाओं से लड़ता हूँ।
दिखलाता हूँ मैं तुझे वही,
जो तूने खुद से छुपाया है,
मैंने ही तो हर बार तुझे,
तेरा असली रूप दिखाया है।
मत कह कि पुराना हो गया मैं,
मत कह कि धूल की मार पड़ी,
तू देख कि तेरे चेहरे पर,
कितनी ही कलुषित धार पड़ी।
तू निखर सके तो निखर जरा,
तू संवर सके तो संवर जरा,
मुझसे नजरें जो मिला सके,
तू उतना निर्भय बन जरा।
मैं टूट गया तो कंकड़ हूँ,
मैं साबुत रहूँ तो दर्पण हूँ,
मैं सत्य का अडिग पुजारी हूँ,
मैं केवल तुझको अर्पण हूँ।
.....सर्वश दुबे
१६/१२/२०१३
