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Monday, March 9, 2026

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के पावन अवसर पर, नारी शक्ति के उन संघर्षों और विजय को समर्पित मेरी यह रचना, जो बंद मुट्ठियों में भविष्य का संकल्प और टूटती कड़ियों में स्वतंत्रता का संगीत समेटे हुए है। आप सभी को महिला दिवस की अनंत शुभकामनाएँ!

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हुंकार उठी अब अंबर में, वह मौन पुराना टूट गया,
मजबूरी की उन रस्सियों का, हर बंधन क्षण में छूट गया।
मत समझो अबला इन कर को, ये कर ही काल कराल हैं,
अन्याय के दुर्ग ढहाने को, इनमें संचित विकराल हैं।
जब-जब जग ने सीमा खींची, तब-तब बन ज्वाला जली यहाँ,
कण-कण में जाग्रत चंडी है, रणभेरी भीषण बजी यहाँ।
श्रृंखल कड़ियाँ थर्राती हैं, मुट्ठी के भीषण प्रहार से,
पर्वत भी रस्ता छोड़ रहे, नारी के सिंह-हुंकार से।
वह रक्त नहीं, वह आन रही, जो रग-रग में अब दौड़ रही,
सदियों की जड़ मान्यताओं को, झटके में आज मरोड़ रही।
मैं शक्तिपुंज, मैं आदि-शक्ति, मैं ही प्रलय की धार हूँ,
अब झुकना मेरे वश में नहीं, मैं विजय की ही जयकार हूँ!
स्वरचित ...सर्वेश दुबे
०८/०३/२०२६