नभ पर उमड़ पड़े फिर बदरा,
बूँदों ने फिर साज़ बजाया।
पर सूने मन के आँगन में,
तेरा कोई दीप न छाया।
छिप-छिपकर नयनों से बहता,
अश्रु विरह का गान सुनाएगा,
तुम न आए, तो यह सावन,
गीत अधूरा गा जाएगा!
पवन गा रही सोंधे नगमे,
हर अमराई झूम रही है।
हरी-भरी धरती की काया,
गगन-अँचल को चूम रही है।
पर जिसको ढूँढें प्राण मेरे,
वह रूप न जब तक मिल पाएगा,
तुम न आए, तो यह सावन,
गीत अधूरा गा जाएगा!
बिजली तड़प-तड़पकर पूछे,
कब तक नीरवता साधोगे?
साँसों की भीगी रातों में,
कब तक केवल याद करोगे?
कागज़ की नैया बह निकली,
पर मन का तट प्यासा रह जाएगा,
तुम न आए, तो यह सावन,
गीत अधूरा गा जाएगा!
दीप बुझे हैं आश-दीप के,
साँस-साँस विकल गाती है।
सावन की यह शीतल बूँदें,
अंगारों-सी सुलगाती हैं।
जो पल बीता विरह-विकल में,
वह फिर न लौट के आएगा,
तुम न आए, तो यह सावन,
गीत अधूरा गा जाएगा!
…….सर्वेश दुबे
स्वरचित। (२४/०७/२०२६)
