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हुंकार उठी अब अंबर में, वह मौन पुराना टूट गया,
मजबूरी की उन रस्सियों का, हर बंधन क्षण में छूट गया।
मत समझो अबला इन कर को, ये कर ही काल कराल हैं,
अन्याय के दुर्ग ढहाने को, इनमें संचित विकराल हैं।
जब-जब जग ने सीमा खींची, तब-तब बन ज्वाला जली यहाँ,
कण-कण में जाग्रत चंडी है, रणभेरी भीषण बजी यहाँ।
श्रृंखल कड़ियाँ थर्राती हैं, मुट्ठी के भीषण प्रहार से,
पर्वत भी रस्ता छोड़ रहे, नारी के सिंह-हुंकार से।
वह रक्त नहीं, वह आन रही, जो रग-रग में अब दौड़ रही,
सदियों की जड़ मान्यताओं को, झटके में आज मरोड़ रही।
मैं शक्तिपुंज, मैं आदि-शक्ति, मैं ही प्रलय की धार हूँ,
अब झुकना मेरे वश में नहीं, मैं विजय की ही जयकार हूँ!
स्वरचित ...सर्वेश दुबे
०८/०३/२०२६
