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Sunday, February 22, 2026

जब पति परदेश जाता है कमाने,विरह,

पीली सरसों लहलहाई,महकी अमवा-डाल।
बिन साजन ये ऋतु सखी, लगती है जंजाल।।

​कोयल बैठी बाग में, गाए विरह की तान।
परदेशी की याद में, सूख रहे हैं प्राण।।

​आया मधुमास द्वार पर, ओढ़े चूनर लाल।
बिरहन बैठी राह में, बुरा हुआ है हाल।।

​घर-आंगन सूना पड़ा, फाग उड़े चहुँ ओर।
मन की वीणा बज रही, खींच रही है डोर।।

​पेट की आग ने छीना है, फागुन का उल्लास।
साजन ढूँढे रोटियाँ, मैं ढूँढूँ उनका पास।।
    सर्वेश दुबे
२१/०२/२०२६

Wednesday, December 31, 2025

First Love, पहला प्रेम

पहला प्रेम कभी ना भूले, 
चाहे कितना जोर लगा लो,
यादों के संदूक पे चाहे, 
कितने भी तुम ताले डालो।

वो कोरे कागज़ पर लिखा, 
पहला उसका नाम निराला,
जैसे तपती धूप में कोई, 
शीतल चंदन की माला।

वक्त की परतें जम जाती हैं,
 चेहरे बदल ही जाते हैं,
नये मुसाफ़िर जीवन की, 
राहों में मिल ही जाते हैं।

पर वो जो पहली दस्तक थी, 
वो गूँज कहीं रह जाती है,
भीड़ भरी इस दुनिया में भी, 
तन्हा हमको कर जाती है।

वह साथ बिताए लम्हें भी, 
तस्वीर बने रह जाते हैं,
वो बिन बात के उसका हँस देना, सब याद हमें रह जाते हैं।

न मका मिला न  मिली है मंजिल, 
बस एक अधूरा किस्सा है,
पर सच तो ये है कि वो ही, 
रूह का अब भी हिस्सा है।

आज भी जब  बारिश की,
 पहली बूंद जो गिरती हैं,
मिट्टी की सोंधी खुशबू में, 
वही यादें फिरती रहती हैं।

भूलना चाहो तो भूले कैसे, 
वो तो रगों में बहता है,
इंसान भले ही बदल जाए, 
पर अहसास वही तो रहता है।

उसे पाने की हसरत नहीं अब, 
न खोने का कोई गम है,
वो बस एक महक है यादों की,
 जो आज भी आँख में नम है।
  .... सर्वेश

Monday, November 10, 2025

संबंधों की परिभाषा, || रुके, देखें और सुने ||

रुके, देखे और सुने
इन तीनों का योग
था,
 मनुष्यों का पहला धर्म,
पहला स्पर्श, पहली पहचान।

जो रुकना नहीं जानते,
वे केवल मिलते हैं
जुड़ते नहीं।
क्योंकि जो जुड़ना चाहता है,
वह पहले अपनी रफ़्तार रख देता है
दूसरे की साँसों के बराबर।

संबंध समय नहीं माँगते,
सिर्फ़ एक सचेत पल बुलाते हैं
जिसमें आप सच में उपस्थित हों।

देखना
सिर्फ़ चेहरा नहीं,
उस पर चढ़ी थकान,
हल्की-सी चिंता,
और मुस्कान के पीछे छिपा
अनबोला संघर्ष।

सुनना
सिर्फ़ शब्दों की ध्वनि नहीं,
उस दिल की धकधक
जो आवाज़ से पहले उठती है।

कई बार “हूँ” भी संवाद होता है,
और कई बार पूरी बात सुनकर भी
लोग कुछ नहीं सुनते।
रिश्ते इन्हीं दोनों के फर्क पर टिके होते हैं।

जो रुक कर सुनता है,
वही मिट्टी को आकार दे पाता है।
जो देख कर समझता है,
वही पेड़ उगा पाता है।
और जो बिना बोले साथ निभाता है,
वही पेड़ को छाया तक ले जाता है।t

संबंध शब्दों से नहीं
इरादों से टिकते हैं।
दिल की सच्ची नमी ही
हर पत्ते को हरा रखती है।

समय सब ठीक कर देता है।
दुनिया यह मानती है
पर सच यह है
समय नहीं,
नीत, नीयत और नर्मी
रिश्तों को थामती है।

जो मन में जगह दे दे,
वह दिल में घर बना लेता है।
जो मौन में सुन ले,
वह जीवनभर समझ में बस जाता है।

रुके, देखे और सुने
इसी क्रम में जन्म लेते हैं
विश्वास, अपनापन, और प्रेम।

और जब यह तीनों जन्म लेते हैं
तो दूरी भी मिटती है,
अहं भी पिघलता है,
और संबंध एक ऐसी डोर बन जाते हैं
जो समय के रस्साकशी में
कभी नहीं टूटता है।
     ........ सर्वेश
     (०९/११/२५)

Friday, October 24, 2025

प्रेम कविता, हमने फूल भेजा

हमने उनको फूल भेजा तो उन्होंने भी गुलाब भेज दिया,

दिल की बात समझे शायद, हमें जवाब भेज दिया।

उनकी आँखों में चमकती है जैसे कोई रौशनी,
ख़्वाब देखा हमने और उन्होंने ख़्वाब भेज दिया।

फ़ासले मिट गए चुपके से उनकी यादों में,
हमने साँस ली मोहब्बत की, उन्होंने हिजाब भेज दिया।

जाने कैसी मोहब्बत है कि असर गहरा हुआ,
हमने लिखी तड़प तो उन्होंने इतराब भेज दिया।

अब तो "सर्वेश" की शायरी भी उनके दिल तक जा पहुँची,
हमने अशआर कहे तो उन्होंने किताब भेज दिया।
       .....सर्वेश दुबे
     ०२- ०९ - २०२५

Thursday, September 11, 2025

जीवन ज्योति

नील नभ के नयन में स्वप्न-दीप टिमटिमाए,
चाँदनी के करों से आँसुओं के रत्न सजाए।

काल-रेत की लहरें हर निशानी बहा ले गईं,
किन्तु पवन के पंखों पर दिशा नई लिख आई।

काँटों की करधनी में कमल-गंध मुस्काई,
वज्र से कठोर वेदना भी मृदु वीणा बन पाई।

तमस-गुफ़ाओं में जब छाया का प्रलय बरसा,
दीपक ने हृदय से प्रभा का आँगन रच डाला।

अश्रु-अंबर से झरे मोती बनकर हर पीड़ा,
विरह-शारदीय शशि-सा, निर्मल हँसी बिखेर लाई।

तूफ़ानों की गर्जना में पतवार गीत गाती,
वज्र-वृष्टि की चोटों को हृदय कमल सहलाता।

मृत्यु की मौन वीणा पर जीवन की तान गूँजी,
शूलों की शैया पर भी कुसुम-गंध महकी।

भाग्य के बंधन जब नागपाश से लिपटे,
धैर्य ने वज्र बनकर हर पाश तोड़ डाले।

स्वप्न-खंडित हज़ार हुए, पर आस्था न टूटी,
ज्योतिर्मय आत्मा से अंधकार झुक गया।

इतिहास यदि पूछे मेरी व्यथा का लेखा,
कहेगा  राख से भी स्वर्ण किला गढ़ा मैंने।
....सर्वेश दुबे
    ०८/०९/२०२५