Sunday, September 20, 2026

नभ पर उमड़ पड़े फिर बदरा,

बूँदों ने फिर साज़ बजाया।

पर सूने मन के आँगन में,

तेरा कोई दीप न छाया।

छिप-छिपकर नयनों से बहता,

अश्रु विरह का गान सुनाएगा,

तुम न आए, तो यह सावन,

गीत अधूरा गा जाएगा!


पवन गा रही सोंधे नगमे,

हर अमराई झूम रही है।

हरी-भरी धरती की काया,

गगन-अँचल को चूम रही है।

पर जिसको ढूँढें प्राण मेरे,

वह रूप न जब तक मिल पाएगा,

तुम न आए, तो यह सावन,

गीत अधूरा गा जाएगा!


बिजली तड़प-तड़पकर पूछे,

कब तक नीरवता साधोगे?

साँसों की भीगी रातों में,

कब तक केवल याद करोगे?

कागज़ की नैया बह निकली,

पर मन का तट प्यासा रह जाएगा,

तुम न आए, तो यह सावन,

गीत अधूरा गा जाएगा!


दीप बुझे हैं आश-दीप के,

साँस-साँस विकल गाती है।

सावन की यह शीतल बूँदें,

अंगारों-सी सुलगाती हैं।

जो पल बीता विरह-विकल में,

वह फिर न लौट के आएगा,

तुम न आए, तो यह सावन,

गीत अधूरा गा जाएगा!

    …….सर्वेश दुबे 

    स्वरचित। (२४/०७/२०२६)

जीवन की यह अजब बनावट

जीवन की यह अजब बुनावट,

सबका अपना-अपना पथ है,

अपनों के ताने-बाने पर,

चलता यह जीवन का रथ है।


कटुता का जब शूल चुभे तब,

रिश्तों की चादर है उधड़ती,

संवाद-सुई और स्नेह-सूत से,

बिगड़ी बात यहाँ सँवरती।


'क्षमा-बूँद' जब उतरी दिल पर,

हर कड़वाहट दूर करे 

 क्षमा का एक टुकड़ा मिलते,

सारे उलझन दूर करे 


उधड़े-उधड़े इस जीवन में,

मृदु प्रेम-तुरपाई कर ले तू,

नफ़रत के सारे पतझड़ में,

नव-मधुमास फिर भर ले तू।


मान और अपमान यहाँ पर,

आते-जाते चंचल मेहमान,

अहंकार की इस आँधी में,

खो जाता मानव का ज्ञान।


अहं मिटाकर, नत मस्तक हो,

समानभूति की राह बना,

इस उलझन से भरे जगत में,

आत्मीयता का मार्ग बना।


सिल्क-सी कोमल इस दुनिया को,

सुलझाना ही जीवन-सार,

सुई-धागे की इस युक्ति से,

सजग रहे निज का संसार।


प्रेम-सुधा की बूँद पिए जो,

उसे मिला हर धागा पावन,

हर उधड़न में नव-सृजन छिपा,

हर मन बन जाता है फिर सावन।

     ….. सर्वेश दूबे 

      स्वरचित २३/०८/२०२६