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Sunday, September 20, 2026

जीवन की यह अजब बनावट

​जीवन की यह अजब बुनावट,

सबका अपना-अपना पथ है,

अपनों के ताने-बाने पर,

चलता यह जीवन का रथ है।


कटुता का जब शूल चुभे तब,

रिश्तों की चादर है उधड़ती,

संवाद-सुई और स्नेह-सूत से,

बिगड़ी बात यहाँ सँवरती।


'क्षमा-बूँद' जब उतरी दिल पर,

हर कड़वाहट दूर करे 

 क्षमा का एक टुकड़ा मिलते,

सारे उलझन दूर करे 


उधड़े-उधड़े इस जीवन में,

मृदु प्रेम-तुरपाई कर ले तू,

नफ़रत के सारे पतझड़ में,

नव-मधुमास फिर भर ले तू।


मान और अपमान यहाँ पर,

आते-जाते चंचल मेहमान,

अहंकार की इस आँधी में,

खो जाता मानव का ज्ञान।


अहं मिटाकर, नत मस्तक हो,

समानभूति की राह बना,

इस उलझन से भरे जगत में,

आत्मीयता का मार्ग बना।


सिल्क-सी कोमल इस दुनिया को,

सुलझाना ही जीवन-सार,

सुई-धागे की इस युक्ति से,

सजग रहे निज का संसार।


प्रेम-सुधा की बूँद पिए जो,

उसे मिला हर धागा पावन,

हर उधड़न में नव-सृजन छिपा,

हर मन बन जाता है फिर सावन।

     ….. सर्वेश दूबे 

      स्वरचित २३/०८/२०२६

Friday, October 24, 2025

प्रेम कविता, हमने फूल भेजा

हमने उनको फूल भेजा तो उन्होंने भी गुलाब भेज दिया,

दिल की बात समझे शायद, हमें जवाब भेज दिया।

उनकी आँखों में चमकती है जैसे कोई रौशनी,
ख़्वाब देखा हमने और उन्होंने ख़्वाब भेज दिया।

फ़ासले मिट गए चुपके से उनकी यादों में,
हमने साँस ली मोहब्बत की, उन्होंने हिजाब भेज दिया।

जाने कैसी मोहब्बत है कि असर गहरा हुआ,
हमने लिखी तड़प तो उन्होंने इतराब भेज दिया।

अब तो "सर्वेश" की शायरी भी उनके दिल तक जा पहुँची,
हमने अशआर कहे तो उन्होंने किताब भेज दिया।
       .....सर्वेश दुबे
     ०२- ०९ - २०२५

Saturday, January 24, 2009

माँ पर कविता

माँ
एक ऐसी रचना जो सब पर भारी है
उसी की सृष्टि ये दुनिया सारी है

माँ पर लिखू कविता मेरे
मित्र ने कि की मुझसे ऐसी कामना
पर माँ को उतार सकू कविताओ मे
ऐसे शब्दों से हो सका न सामना

फ़िर मै हताश निराश हो शब्दो को
ढुढने का खत्म कर दिया प्रयास
और खो गया बचपन की उस दुनिया मे
जब मेरी माँ ही मेरे लिये है सबसे खास

माँ के वात्सल्य भाव का ऐसी है भूमिका
चित्र ना उतार सके बनी न ऐसी तूलिका
माँ के अनन्त उपकार को तू कभी भी मत भुला
तोल सके जिससे तू बन सकी ना वो तुला

माँ असीम दर्द से भरे उन नौ महिने को
अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण मानती है
हमारे आखों मे बहने वाला आसू
सुख या दर्द के है वो सब जानती है

मां के विश्वास ने मुझमे
आत्मविश्वास का बीज बो दिया
उसकी त्याग ने सही रास्ते पे लाकर
मुझे इन्सान बना दिया

क्षमा करो ये मित्र मुझे तुम,
लिख सका ना माँ पर कविता
शब्दों मे मै ढुढ सका ना
ऐसी होती माँ की ममता ॥

Thursday, November 13, 2008

ये मन का जो रिश्ता है

भावो मे बस दिखता है
ये मन का जो रिश्ता है

ना वासना, ना लालच
ना पैसे से बिकता है
ये मन का जो रिश्ता है।

लाख छिपाये दुनिया से तू
पर आँखो मे बसता है
ये मन का जो रिश्ता है।


ना कोई भाषा ना परिभाषा
तेरी खुशियाँ मेरी आशा
नाम नया क्या दू
इस रिश्ते को
ये बस मन का रिश्ता है।

तेरे हर आहट का स्पन्दन
मेरे दिल को कैसे होता
मै तो बस इतना ही जानू
ये मन का जो रिश्ता है

ना टूटे ये साथ कभी
दिल ये ही आशा करता है
रंग रूप ना और कोई सीमा
ये मन का जो रिश्ता है।

ना चाँहू मै धन तेरा
ना चाँहू मै तन तेरा
बना रहे ये भाव हमारा
ये मन का जो रिश्ता है।

इस रिश्ते कि डोर सभी रे
हाथ हमारे है मितवा
ये टुटे तो दिल दुखता है
ये मन का जो रिश्ता है।