Thursday, March 19, 2026

वफ़ा, trust,

​जब वफ़ा की बात करोगे,
याद हमारी आएगी।
नयन तुम्हारे भीगे होंगे,
पलकें भी झुक जाएँगी।

​वो जो ख़ामोश सा पत्थर है,
तेरे घर के रस्ते में,
ठोकर जब भी खाओगे तुम,
याद तुझे मेरी आएगी।

​भीड़ खड़ी होगी दुनिया की,
 दिलासे झूठे  देने को,
पर रूह तुम्हारी तन्हाई में,
बस हमको ही बुलाएगी।

​कसमों के उन मलबों के नीचे,
दब जाएगा शोर तेरा,
खामोशी जब चीखेगी तब,
दुनिया भी थम जाएगी।

​दबे पाँव जब गुज़रे लम्हे,
खिड़की पर दस्तक देंगे,
सन्नाटों की भीड़ में तब,
आहें शोर मचाएंगी।

महफ़िल में जब जिक्र चलेगा, 
वफ़ा मुकम्मल क्या होती,
लब तुम्हारे चुप रहेंगे, पर ये ख़ामोशी शोर मचाएगी।

​सोचोगे तुम मुड़कर जब भी,
उस बीते हुए ज़माने को,
मेरी वफ़ा की हर एक सच्चाई,
तुझको बहुत रुलाएगी।

​तुम लाख छुपाओ दुनिया से,
कि रिश्ता कुछ भी शेष नहीं,
पर लफ्ज़ों की हर लरज़िश ,
मेरा ही किस्सा  बतलाएगी

​जब वफ़ा की बात करोगे,
याद हमारी आएगी।
   .....सर्वेश दुबे
     १५/०३/२०२६

Monday, March 9, 2026

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के पावन अवसर पर, नारी शक्ति के उन संघर्षों और विजय को समर्पित मेरी यह रचना, जो बंद मुट्ठियों में भविष्य का संकल्प और टूटती कड़ियों में स्वतंत्रता का संगीत समेटे हुए है। आप सभी को महिला दिवस की अनंत शुभकामनाएँ!

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हुंकार उठी अब अंबर में, वह मौन पुराना टूट गया,
मजबूरी की उन रस्सियों का, हर बंधन क्षण में छूट गया।
मत समझो अबला इन कर को, ये कर ही काल कराल हैं,
अन्याय के दुर्ग ढहाने को, इनमें संचित विकराल हैं।
जब-जब जग ने सीमा खींची, तब-तब बन ज्वाला जली यहाँ,
कण-कण में जाग्रत चंडी है, रणभेरी भीषण बजी यहाँ।
श्रृंखल कड़ियाँ थर्राती हैं, मुट्ठी के भीषण प्रहार से,
पर्वत भी रस्ता छोड़ रहे, नारी के सिंह-हुंकार से।
वह रक्त नहीं, वह आन रही, जो रग-रग में अब दौड़ रही,
सदियों की जड़ मान्यताओं को, झटके में आज मरोड़ रही।
मैं शक्तिपुंज, मैं आदि-शक्ति, मैं ही प्रलय की धार हूँ,
अब झुकना मेरे वश में नहीं, मैं विजय की ही जयकार हूँ!
स्वरचित ...सर्वेश दुबे
०८/०३/२०२६