बूढ़े दरख़्त की छांव में, माँ-बाप के पाँव में।
सारा सुख बसा यहाँ, जैसे शीतल गाँव में।।
दुनिया की मधुशाला में सब, मदिरा पीकर चूर यहाँ,
कोई पद का लोभी बैठा, कोई मद में मग़रूर यहाँ।
पर तृप्ति जहाँ मिल जाती है, उस निश्छल से ठाँव में—
सारा सुख बसा यहाँ, जैसे शीतल गाँव में।।
मृगतृष्णा की रेती पर जब, पाँव थकन से जलते हैं,
झूठे जग के रिश्तों के जब, काँटे मन में खलते हैं।
तब मरहम सा अहसास छिपा, ममता की परछाँव में—
सारा सुख बसा यहाँ, जैसे शीतल गाँव में।।
सर्वेश, न मंदिर की मूरत, न काबे की है धूल बड़ी,
घर की उस बूढ़ी चौखट पर, जन्नत की है राह खड़ी।
हर तीर्थ सिमटकर आता है, इन वंदन के पाँव में—
सारा सुख बसा यहाँ, जैसे शीतल गाँव में।।
....सर्वेश दुबे
स्वरचित २४/०२/२०२६


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