अहंकार के बीज मनों में, रोज़ नए उग आते हैं। क्रोध, लोभ और मोह के बादल, सत्य-सूर्य को ढक जाते हैं।
हर वर्ष रावण के पुतले,
हम चौराहों पर जलाते हैं।
लेकिन मन के दस सिर वाले,
रावण को गले लगाते हैं।
बाहर अग्नि प्रज्वलित करके,
भीतर तम क्यों रहने दें?
अपने ही दुर्गुणों को आख़िर,
कब तक और सहने दें?
मन में सोए राम को जागृत,
अब हम सभी को करना है।
अज्ञान, दंभ और छल के विरुद्ध,
नित संघर्ष हमें करना है।
अन्यायों के सम्मुख झुकना,
ना अपना ये स्वभाव रहे ।
सत्य-पथों से पाँव डिगें न,
मन में ऐसा भाव रहे।
धैर्य बने धनुष हमारा,
शील बने तरकश की शान।
संयम के तीक्ष्ण बाण से,
जीतें मन के युद्ध महान।
दीप जलाएँ ज्ञान-प्रभा के,
मिटे हृदय का अंधकार।
प्रेम, दया और सत्य से सज्जित,
हो जीवन का हर व्यवहार।
विजय-पर्व का अर्थ तभी है,
जब मन निर्मल हो जाए।
रावण केवल बाहर ही नहीं,
भीतर से भी जल जाए।
…….सर्वेश दुबे
२०/१०/२०२६

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