मेरे सभी मित्रों को समर्पित
जीवन की इस विषम पहेली का, जब कोई हल न मिल पाए,
मित्र बन स्नेह-समीर सा तब, जो तपते मन को सहलाए।
न कोई सौदा, न कोई मोल, न स्वार्थों का यहाँ व्यापार,
सूखे मन के मरुथल पर, जैसे सावन की पहली फुहार।
कोई हँसकर हाथ थाम ले, कोई पीड़ा हरता जाए,
मित्र वही जो मौन वेदना, बिन बोले ही पढ़ता जाए।
संकट की घनघोर रात में, जो बन ढाल खड़ा हो जाए,
मित्र वही जो जीवन-पथ का, सच्चा वरदान कहाए।
ढलती साँझ, या भोर भली हो, थामे हाथ बने मेरी शान,
सुख-दुख की हर कठिन डगर में, मित्र बने मेरा अभिमान।
सागर की लहरें गरज उठें, या बरसें मेघ जो घनघोर,
सच्चा मित्र अटल हिमगिरि-सा, दे साहस हमको चहु ओर।
अमिट रहे यह स्नेह-कलश, युग-युग तक रस बरसाए ,
प्रेम-सुधा से जीवन का कण-कण, मधुमय होता जाए।
आओ मिलकर आज मनाएँ, इस बंधन की शाश्वत मिठास,
मित्र ही जीवन का पर्याय, और वही परम विश्वास।
…..सर्वेश दूबे
स्वरचित
०२/०८/२०२६


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