Wednesday, February 25, 2026

सतोलिया, सात पत्थर

पिट्टू (Pittu), जिसे सात पत्थर, लगोरी, या सतोलिया के नाम से भी जाना जाता है, भारत का एक पारंपरिक खेल है। यह खेल मुख्य रूप से दो टीमों के बीच एक गेंद और सात चपटे पत्थरों के साथ खेला जाता है।  बचपन के उसी खेल को जीवन से जोड़ने का एक छोटा प्रयास....

वो सात पत्थरों का पिट्ठू, वो मिट्टी की जागीर कहाँ,
आज हाथों में वैभव सारा, पर बचपन की तस्वीर कहाँ?
गेंद लगी और महल ढहा, पर मन में एक उल्लास रहा,
बिखर-बिखर कर जुड़ जाने का, अद्भुत एक विश्वास रहा।
तब गिरना भी इक उत्सव था, फिर जुड़ने की इक आशा थी,
उन बेजान से पत्थरों में भी, जीवन की परिभाषा थी।
​पर आज खड़ा इस मोड़ पर, मैं सोच-सोच कर दंग हूँ,
क्या वही गेंद अब 'समय' बनी? क्या मैं खुद से ही तंग हूँ?
क्यों आज समय की एक चोट, सपनों को धूल चटाती है?
क्यों बचपन की वो खिलखिलाहट, अब भीतर मर जाती है?
तब पत्थर को चुनना भी, इक नया जन्म पा जाना था,
फिर एक हार के सबक से ही, मैंने खुद को पहचाना था।
​उठा ले पत्थर स्मृतियों के, तू फिर से अपनी नींव सजा,
उस हार के मरुस्थल में भी, तू जीत की अपनी प्यास जगा।
बिखरना तो बस रीति यहाँ, नूतन सृजन की बेला है,
हर पतझड़ के बाद ही तो, बसंत की अद्भुत बेला है ।
मत मान हार इन चोटों से, तू फिर से अपना दाँव लगा,
बिखरना ही तो शुरुआत है, अब जीत का नया इतिहास जगा।
   .....सर्वेश दुबे 
स्वरचित

Tuesday, February 24, 2026

माँ बाप, गांव, छांव, दरख़्त

बूढ़े दरख़्त की छांव में, माँ-बाप के पाँव में।

सारा सुख बसा यहाँ, जैसे शीतल गाँव में।।

​दुनिया की मधुशाला में सब, मदिरा पीकर चूर यहाँ,

कोई पद का लोभी बैठा, कोई मद में मग़रूर यहाँ।

पर तृप्ति जहाँ मिल जाती है, उस निश्छल से ठाँव में—

सारा सुख बसा यहाँ, जैसे शीतल गाँव में।।

​मृगतृष्णा की रेती पर जब, पाँव थकन से जलते हैं,

झूठे जग के रिश्तों के जब, काँटे मन में खलते हैं।

तब मरहम सा अहसास छिपा, ममता की परछाँव में—

सारा सुख बसा यहाँ, जैसे शीतल गाँव में।।

​सर्वेश, न मंदिर की मूरत, न काबे की है धूल बड़ी,

घर की उस बूढ़ी चौखट पर, जन्नत की है राह खड़ी।

हर तीर्थ सिमटकर आता है, इन वंदन के पाँव में—

सारा सुख बसा यहाँ, जैसे शीतल गाँव में।।

   ....सर्वेश दुबे 

स्वरचित २४/०२/२०२६

Sunday, February 22, 2026

जब पति परदेश जाता है कमाने,विरह,

पीली सरसों लहलहाई,महकी अमवा-डाल।
बिन साजन ये ऋतु सखी, लगती है जंजाल।।

​कोयल बैठी बाग में, गाए विरह की तान।
परदेशी की याद में, सूख रहे हैं प्राण।।

​आया मधुमास द्वार पर, ओढ़े चूनर लाल।
बिरहन बैठी राह में, बुरा हुआ है हाल।।

​घर-आंगन सूना पड़ा, फाग उड़े चहुँ ओर।
मन की वीणा बज रही, खींच रही है डोर।।

​पेट की आग ने छीना है, फागुन का उल्लास।
साजन ढूँढे रोटियाँ, मैं ढूँढूँ उनका पास।।
    सर्वेश दुबे
२१/०२/२०२६