Wednesday, January 28, 2026

प्रेम, मिलन, love,

प्रेम कोई उत्सव नहीं, जो शोर में मनाया जाए,
प्रेम तो वह प्रार्थना है, जो बस एकांत में  ही दोहराया जाए।
यह दो शरीरों का मिलन भर नहीं है महज,
यह एक आत्मा का दूसरी में, चुपके से उतर जाना है।

​जैसे रेत के भीतर कहीं कोई सोता (झरना) बहता है,
जैसे पतझड़ के बाद भी पेड़ों में विश्वास रहता है,

वैसे ही प्रेम, अभावों में भी पूर्णता की तलाश है,
यह धरती के हृदय में छिपे, असीम आकाश का आभास है।

​इसमें पाना कुछ भी नहीं, बस खोते चले जाना है,
खुद को मिटाकर, किसी और में हो जाना है।

जहाँ शब्द थक कर लौट आते हैं चौखट से अक्सर,
वहाँ से शुरू होता है, प्रेम के मौन का मीठा सफर।

​न कोई शर्त है इसकी, न कोई इसका किनारा है,
प्रेम तो बस... डूबते हुए को डूबने का ही सहारा है।

  स्वरचित ....सर्वेश दुबे
   २७/०१/२०२६

Tuesday, January 20, 2026

शीर्षक- प्रज्ञा-ज्योति: साक्षरता का महायज्ञ


तटिनी-तट पर बैठी माँ, देती ये पावन संदेश,
ज्ञान के आलोक से ही, मिटे अविद्या का क्लेश।
श्वेत कमल पर विराजित, शुभ्र-वसना शारदे,
जड़ जगत की मूढ़ता को, बोध का वरदान दे।
वो स्वर्ण-रश्मि जो फैली, हर दिगंत के भाल पर,
जगाए चेतना को माँ, हर एक के अंतस्तल पर।
नीरव जल के स्पंदन में, शिक्षा का आभास हो,
देश के हर आँगन में, अब साक्षरता का वास हो।
वीणा के हर तार से, गूँजे ज्ञान का तीव्र नाद,
मिट जाए जग से अब, अशिक्षा का यह विषाद।
अनपढ़ता की बेड़ियों को, अब हर मानव तोड़ेगा,
पुस्तक से नाता जोड़कर, प्रगति-पथ पर दौड़ेगा।
माँ! तव आशीष से ही, लेखनी यह सक्षम बने,
अंधकार से लड़ने को, हर हाथ एक मशाल तने।
हर बालक और बालिका, शिक्षा का अधिकार पाए,
ज्ञान का अमृत पीकर, अपना भविष्य स्वयं सजाए।
ज्ञान का दीपक जले, हर घर और हर ग्राम में,
सार्थकता हो जीवन की, विद्या के शुभ काम में।
सृजन की ऊर्जा बहे, इस राष्ट्र के हर प्राण में,
साक्षर बने भारत हमारा, गूँजे ये हर कान में।
रचनाकार: सर्वेश दुबे 
१८/०१/२०२६

Friday, January 16, 2026

सोच, Thought Process,

आपकी सोच ही आपकी जीवन विधाता है,
यही वो सूत्र है, जो भाग्य को जगाता है।
न कोई ग्रह-नक्षत्र, न कोई लकीर हाथ की,
सोच ही तय करती है, सीमा हर बात की।
जैसा भाव मन में है, वैसी ही सृष्टि है,
सोच अगर सुंदर हो, तो पावन हर दृष्टि है।
दुखों के अंधेरे में भी, जो उम्मीद सजाता है,
वही तो अपनी राह का, सूरज बन जाता है।
गिरे हुए को उठा दे, या उड़ते को गिरा दे,
सोच चाहे तो मिट्टी को भी, सोना बना दे।
दुनिया का हर मंजर, बस एक आईना है,
अपनी ही सोच को, बस खुद ही पहचाना है।
कठिन रास्तों पर भी जो, खिलखिलाता है,
वो अपनी तकदीर, खुद ही लिखता जाता है।
याद रखना यह सच, जो जग को भाता है,
आपकी सोच ही आपकी जीवन विधाता है।
     ....... सर्वेश दुबे 
        १५/०१/२०२६
           
 

Friday, January 2, 2026

तू और सिर्फ तू

दुनिया ने भावनाओ में सबसे बड़ा और आबादी में सबसे छोटा मुल्क  मेरा दिल है
इसकी कुल और कुल आबादी सिर्फ तू है।
नक़्शे में दर्ज़ नहीं ये सरहदें मेरी,
मेरी हर हद, हर आज़ादी सिर्फ तू है।

यहाँ क़ानून नहीं, एहसास चलते हैं,
मेरी हर एक अदालत की गवाही सिर्फ तू है।
तेरी ख़ामोशी से लगता है कर्फ़्यू यहाँ,
मेरी हर इक बग़ावत की वजह सिर्फ तू है।
शहर वीरान लगे, अगर तू न दिखे,
मेरी हर एक रौनक में सिर्फ तू है।
न तख़्त चाहिए, न ताज, न हुकूमत कोई,
मेरी हर एक सल्तनत की बुनियाद सिर्फ तू है।
यहाँ जंगें नहीं होतीं, बस इंतज़ार रहता है,
मेरी हर एक जीत, हर इक शिकस्त सिर्फ तू है।
मेरे हर ख़्वाब की ताबीर में तू ही तू,
मेरी हर एक दुआ की इबादत सिर्फ तू है।
अगर पूछे कोई मुझसे मेरी पहचान क्या है,
मेरी हर एक कहानी की पहचान सिर्फ तू है।
दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए,
मेरे इस छोटे से दिल की पूरी कायनात सिर्फ तू है।
 .....सर्वेश दुबे